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Sunday, 9 April 2017

ज़िन्दगी फिर से गुनगुनाऊ मैं

@2015 बस यादेँ सिर्फ यादेँ...........

ज़िन्दगी फिर से गुनगुनाऊ मैं,
खो गया हूँ मैं कहीं फिर से खोज लाऊं मैं,
सोचता हूँ ज़िन्दगी तुझे फिर से गुनगुनाऊ मैं,
कभी लगा की ज़िन्दगी,
कोई परी कथा सी है,
कभी लगा की जिन्दगी,
तितली की व्यथा सी है,
बादल की उमंग सी,
कभी कटी पतंग सी,
हवाओं की स्वच्छंदता,
कभी लगा की कैद है,
बहती हुई नदी कोई,
कभी रुकी सदी कोई,
मिली तो चाँद की तरह,
गुमी तो स्वपन की तरह,
खो गयी जो स्वपन में, कहीं से खोज लाऊं मैं,
सोचता हूँ ज़िन्दगी तुझे फिर से आजमाऊं मैं,
कभी लगा की प्यार है,
तो हाथ में ज़हान है,
कभी लगा की यार है,
तो साथ में ज़हान है,
कभी लगा की पा लिया,
कभी लगा की खो दिया,
कभी दोस्त सी लगी,
कभी अजनबी ये जिंदगी,
पिता के हाथ सी कभी,
माँ के साथ सी कभी,
मन किया तो संग चली,
पल में बिछुड गयी कभी,
खो गयी जो राह में, फिर से खोज लाऊं मैं,
सोचता हूँ ज़िन्दगी तुझे फिर से अब सजाऊं मैं,
कभी तपन थी पाप सी,
कभी डसे वो सांप सी,
कभी लगे तूफान सी,
कभी कोयलों के गान सी,
जिन्दगी तू मीत भी,
कभी बनी प्रीत भी,
तू आस्था ,विश्वास भी,
तू मेरे मन की आस भी,
बचपने के खेल सी,
प्रियतमा से मेल सी,
समझ न पाया आज तक,
किस बात पे खफा हुई,
रूठ के जो चली गयी, तुझे फिर से खोज लाऊं मैं,
सोचता हूँ जिंदगी, तुझे फिर से अब मनाऊं मैं,
कभी चूड़ियों सी खनक गयी,
कभी शीशे सी चटक गयी,
तू कभी तमस ,कभी रौशनी,
कभी ख़यालो सी भटक गयी,
कभी भंवर सी वाचाल तू,
कभी साहिलो सी खामोश थी,
कभी आँखों में हंसी तेरे,
कभी शाम सी उदास थी,
तू न समझ सकी मुझे,
न मैं ही समझ सका तुम्हें,
कभी नरक की थी यातना,
कभी स्वर्ग का एक ख्वाब़ थी,
तू न समझ सकी मुझे,
न मैं ही समझ सका तुम्हें,
तू जो भी है अज़ीज़ है, कहीं से खोज लाऊं मैं,
सोचता हूँ जिंदगी, तुझे, फिर गले लागाऊं मैं........

****** नितिश श्रीवास्तव ******

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