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Saturday, 8 June 2013

मीलों चलता चलता जब में थक जाता हुँ















@ 2013 बस यादें सिर्फ यादें ...............
मीलों चलता चलता जब में थक जाता हुँ
रुकता हुँ दम भर को ,
क्या सब रुक जाते है ?
खुशियों के कई ढेर लगा कर में हसंता रहता हूँ
मुस्काता हुँ खो जाता हूँ ,
क्या सब खो जाते हैं ?
बादक के मतवारे मौसम में बह जाता हुँ ,
ठंडी हवा में उड जाता हूँ ,
क्या सब उड़ जाते है ?
मेरे सपने मिलकर मुझसे जब खो जाते है
मैं ड़र जाता हूँ ,रो जाता हूँ ,
क्या सब रो जाते है ?
देख कर अपनो को खुश होता हूँ ,
एक ही रंग में रगं जाता हूँ ,
क्या सब रगं जाते हैं ?
दुनिया के सब करतब देख में हैरान रह जाता हूँ ,
जादू सी दुनिया में जादू सा हो जाता हूँ
क्या सब हो जाते हैं ?
चोट जब दिल को लगती है टूट जाता हूँ ,
लड़ता हूँ , अल्लाह अल्लाह करता हूँ ,
क्या सब करते है ?
क्या में जो जो करता हूँ सब करते है ?
जीवन के सुख-दुख मे कठपुतली से ,
क्या सब हो जाते हैं ?
मासुम सा बच्चा हूँ इन्सान के दिल में बसता हूँ ,
मैं इन्ही कारणो से इन्सान कहलाता हु ,
क्या सब कहलाते है ..............................
::::::::::::नितीश श्रीवास्तव :::::::::::::

4 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    चलना ही तोे जीवन है, तभी तो मंजिल मिलेगी!

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार (11-06-2013) के "चलता जब मैं थक जाता हुँ" (चर्चा मंच-अंकः1272) पर भी होगी!
    सादर...!
    शायद बहन राजेश कुमारी जी व्यस्त होंगी इसलिए मंगलवार की चर्चा मैंने ही लगाई है।
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  3. सब प्रश्न का जवाब तो नहीं मिल सकते पर जो मिले उसे स्वीकार करो ना करो तुमपर है.
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  4. bahut bahut dhanyavad aap sab ka ye pyar hamare prati bana rhe............................

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