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Sunday, 23 June 2013

विरह अगन सी तपन कहाँ है, दुनिया भर की आगों में,
















@ 2013 बस यादें सिर्फ यादें ...............
विरह अगन सी तपन कहाँ है, दुनिया भर की आगों में,
पिरो लिए कंचन से मोती, प्यार के पक्के धागों में,
भीग रही है धरती सारी, छलक रही इन बूँदों से,
तुम कहते हो आँख के आंसू, सूख गये सब यादों में.
या तो इस मौसम से कह दो, इतना मत हैरान करो,
या कि तुम खुद ही आ जाओ, इस दिल पर अहसान करो,
अब तक मैने जीवन काटा, निविड़ मावसी रातों सा,
मेरी राहें रोशन कर दो, जीना कुछ आसान करो.
सोच रहा हूँ आखिर कब तक, तन्हाई को सहना है
मेरी आँखें सब कहती हैं, मुझे नहीं कुछ कहना है,
साँस मेरी है चलती जाती, केवल इक इस आशा में,
एक दिवस पत्थर पिघलेगा, मुझको जिन्दा रहना है.........................

::::::::::::नितीश श्रीवास्तव :::::::::::::

8 comments:

  1. वियोग श्रंगार की बहुत सुन्दर रचना पेश की है आपने, जो जीवन में आशा का संचार करती है।
    शुभकामनाएँ..!

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा आज रविवार (24-06-2013) को अनसुनी गुज़ारिश और तांडव शिव का : चर्चामंच 1286 में "मयंक का कोना" पर भी है!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. This comment has been removed by the author.

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  4. बहुत उम्दा,सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति

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  5. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार २५ /६ /१३ को चर्चा मंच में राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका वहां हार्दिक स्वागत है ।

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  6. विरह का बहुत ही मर्मिक वर्णन किया है..

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  7. ग़ज़ब की कविता ... कोई बार सोचता हूँ इतना अच्छा कैसे लिखा जाता है

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