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Friday, 18 October 2013

तुम्हे तो तुम्हारी राह मालूम है
















@ 2013 बस यादें सिर्फ यादें ........................
तुम्हे तो तुम्हारी राह मालूम है
वही राह जो पहले से मौजूद
पक्की सड़कों से बनती है
तुम जहाँ भी जाते हो
उन्हीं सड़कों के दोनों ओर
ऊँची इमारतें बढ़ाते जाते हो
सोने-चांदी की खोज में
बड़े गढ्ढे बनाते जाते हो
इमारतें, सोना, चांदी और गढ्ढे
क्या यही तुम्हारी मंज़िलें हैं?
और मेरी मंज़िलें?…
मैं तो दिशाहीन हूँ, गंतव्य-विहीन हूँ
मेरी राहें तो, ऐ दोस्त, अक्सर
घने जंगलों से गुज़रती हैं
वहाँ, जहाँ पहले कोई नहीं गया वहीं पर…
मैं पगडंडी बनाता जाता हूँ
कुछ दीप जलाता जाता हूँ
कुछ गांव बसाता जाता हूँ
कुछ बाग लगाता जाता हूँ
कुछ फूल खिलाता जाता हूँ
क्योंकि…
मैं दिशाहीन हूँ
मैं गंतव्य-विहीन हूँ! .........................
::::::::::::नितीश श्रीवास्तव ::::::::::

2 comments:

  1. वाह ! बहुत सुंदर ! पर आज के युग में ये कच्ची सड़कें तथाकथित 'विकास' के खांचे में कहाँ फिट बैठती हैं !

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