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Friday, 18 October 2013

देखता हूँ हर रोज़,आईने में अपने आप को
















@ 2013 बस यादें सिर्फ यादें ..................
देखता हूँ हर रोज़,आईने में अपने आप को
खुश होता हूँ देखकर बाहरी रूप
इतने अरसो बाद भी
वैसा ही है,मुस्कुराता,महकता
तसल्ली सी होती है,पर अधूरी सी
पूछ लेता हूँ आईने से एक प्रश्न
क्या कभी दिखा पाएगा मुझे मेरा अंतर मन?
मेरी भावनाओ का उतार चढ़ाव ,समझाएगा मुझे
जवाब में आईने पर,बस एक स्मीत की रेशा
शायद अनकहे ही जान जाता हूँ उसकी भाषा
मेरी भावनाओ पर मुझे ही है चलना
गिरते,उठते मुझे ही संभालना
छोटिसी ज़िंदगी है,करूँगा सुहाना अपना सफ़र
हर बात का नही करूँगा रक्स
अंतरमन जब भरा होगा शांति और सयम से
तब आईना भी दिखाएगा,मेरा छूपा हुआ अक्स................................
::::::::::::नितीश श्रीवास्तव :::::::::::

4 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शुक्रवार (18-10-2013) "मैं तो यूँ ही बुनता हूँ (चर्चा मंचःअंक-1402) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बहुत सुन्दर रचना | आपका ब्लॉग फॉलो कर लिया है, आप भी आयें |

    मेरी नई रचना:- "झारखण्ड की सैर"

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  3. आपके ब्लॉग को ब्लॉग"दीप" में शामिल किया गया है | जरूर पधारें और हमे फॉलो कर उत्साह बढ़ाएँ |

    ब्लॉग"दीप"

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