Followers

Google+ Followers

Friday, 18 October 2013

संध्‍या सिंदूर लुटाती है














@ 2013 बस यादें सिर्फ यादें ........................
संध्‍या सिंदूर लुटाती है!
रंगती स्‍वर्णिम रज से सुदंर
निज नीड़-अधीर खगों के पर,
तरुओं की डाली-डाली में कंचन के पात लगाती है!
संध्‍या सिंदूर लुटाती है!
करती सरि‍ता का जल पीला,
जो था पल भर पहले नीला,
नावों के पालों को सोने की चादर-सा चमकाती है!
संध्‍या सिंदूर लुटाती है!
उपहार हमें भी मिलता है,
श्रृंगार हमें भी मिलता है,
आँसू की बूंद कपोलों पर शोणित की-सी बन जाती है!
संध्‍या सिंदूर लुटाती है.......................
::::::::::::नितीश श्रीवास्तव ::::::::::::

No comments:

Post a Comment